Poem on nature

Yadon ka sawan

विज्ञान की तमाम सफलताओं के बावजूद प्रकृति कोें हुई हानि के लिए प्रकृति की एक आवाज!

सोचा नहीं कभी तुमने!

सोचा नहीं कभी तुमने!
क्यों आया था इस जग में!!
उड़ना सिखा जो तूने नभ में!
खलबली मच गयी विहग में!!

तारों की दुनिया में !
जो तूने कदम रखा!!
शिकायत हुई चन्दा को तुमसे!
क्यों आ गये तुम मेरे नभ में!!

तू रह गया निरुत्तर!
चुभन हुई पग पग में!!
हासिल है मुकाम सभी!
जो व्याप्त है उस जग में!!

छिपा था जो राज इस वसुधा में!
खोज लिया है सब तूने!!
मत बन अब तू क्रूर निर्मोही!
क्या धरा है इस जग उस जग में!!

सोचा नहीं कभी तुमने!
क्यों आया था इस जग में!! जी एल.
*नभ- आकाश
*विहग- पक्षी
*मुकाम- साधन
*वसुधा- पृथ्वी

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Yadon ka sawan

निवेदन:- आइये इस बरसात में अपने सुखद भविष्य के लिए एक पेड़ लगाएं! Share plz….

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